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ज्ञानभारतम पांडुलिपि सर्वेक्षण अभियान में सामने आई प्राचीन ज्ञान परंपरा की विरासत

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ज्ञानभारतम पांडुलिपि सर्वेक्षण अभियान में सामने आई प्राचीन ज्ञान परंपरा की विरासत

रायपुर।राज्य में संचालित ज्ञानभारतम पांडुलिपि सर्वेक्षण अभियान के अंतर्गत सरगुजा जिले के लुण्ड्रा विकासखंड के ग्राम दोरना में दुर्लभ ताड़पत्र पांडुलिपियों का महत्वपूर्ण संग्रह प्राप्त हुआ है। यह खोज क्षेत्र की प्राचीन ज्ञान परंपरा, धार्मिक साहित्य और लोकवैद्यकीय विरासत को संरक्षित करने की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है।

लुण्ड्रा विकासखंड की मुख्य कार्यपालन अधिकारी श्रीमती प्रीति भगत की सूचना पर सर्वेक्षण दल ग्राम दोरना पहुंचा, जहां 78 वर्षीय पांडुलिपि संरक्षक साधु शाह के निवास पर वर्षों से सुरक्षित रखी गई दुर्लभ ताड़पत्र पांडुलिपियां मिलीं। सर्वेक्षण टीम ने साधु शाह को पांडुलिपि संरक्षण योजना की जानकारी देते हुए उनसे संग्रह देखने का आग्रह किया। इस दौरान उन्होंने अपने पूजाघर में सुरक्षित रखे पांडुलिपियों के दो बड़े बंडल प्रस्तुत किए। इनमें एक बंडल ‘कार्तिक महात्म्य’ तथा दूसरा ‘रामायण’ के बालकाण्ड और अयोध्या काण्ड से संबंधित था।

श्री साधु शाह ने बताया कि उनके पिता स्वर्गीय वृंदावन शाह इन पांडुलिपियों का नियमित पाठ किया करते थे और परिवार ने पीढ़ियों से इन्हें सहेजकर रखा है। उन्होंने बताया कि ताड़पत्र पांडुलिपियों की सबसे बड़ी विशेषता यह होती है कि इनमें स्याही का प्रयोग नहीं किया जाता। अक्षरों को लोहे की नुकीली कलम से ताड़पत्र पर उकेरा जाता है, जिससे लेखन लंबे समय तक सुरक्षित बना रहता है।

सर्वेक्षण टीम ने बताया कि अत्यधिक प्राचीन होने के कारण अब इन पांडुलिपियों के अक्षर धूमिल पड़ने लगे हैं। पारंपरिक पद्धति के अनुसार जब इन धुंधले अक्षरों पर हल्दी मल दी जाती है तो लेखन पुनः स्पष्ट दिखाई देने लगता है। यह प्राचीन भारतीय लेखन तकनीक और संरक्षण पद्धति का अद्भुत उदाहरण है। श्री साधु शाह ने यह भी बताया कि उनके पास वैद्यकी और पारंपरिक चिकित्सा ज्ञान से जुड़ी कई महत्वपूर्ण पांडुलिपियां थीं, लेकिन पर्याप्त सुरक्षा और संरक्षण के अभाव में वे दीमकों के कारण नष्ट हो गईं। उल्लेखनीय है कि साधु शाह स्वयं भी पारंपरिक वैद्य हैं और वर्षों से लोक चिकित्सा पद्धति से लोगों का उपचार करते आ रहे हैं। ज्ञानभारतम पांडुलिपि सर्वेक्षण अभियान के तहत प्राप्त इन पांडुलिपियों की जानकारी को डिजिटल रूप से अपलोड करने का कार्य अजित कंवर द्वारा किया गया। 

विशेषज्ञों के अनुसार यह अभियान न केवल प्राचीन ज्ञान और सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण में सहायक सिद्ध होगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को भारतीय परंपरा, साहित्य और लोकज्ञान से जोड़ने का महत्वपूर्ण माध्यम भी बनेगा। राज्य में चलाया जा रहा यह सर्वेक्षण अभियान ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों में संरक्षित दुर्लभ पांडुलिपियों को खोजने, उनका दस्तावेजीकरण करने और उन्हें डिजिटल रूप से सुरक्षित करने की दिशा में लगातार कार्य कर रहा है। ज्ञानभारतम अभियान के माध्यम से ऐसी अमूल्य धरोहरों को संरक्षित कर प्रदेश की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को नई पहचान देने का प्रयास किया जा रहा है।


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