बालोद के तुएगोंडी-पाटेश्वर धाम (जामड़ीपाठ क्षेत्र) विवाद में एक ऐसा मोड़ आ गया है जिसने इस राजनैतिक टकराव को पूरी तरह से लोक-आस्था और प्राकृतिक न्याय की ओर मोड़ दिया है। कलेक्ट्रेट के सामने होने वाली नारेबाजी और कागजी दस्तावेजों से परे, अब इस मामले में एक गहरा आध्यात्मिक कोण (Spiritual Angle) जुड़ गया है।
पीढ़ियों से इस जंगल को अपना घर मानने वाले मूल जनजातीय समाज और बुजुर्गों का साफ कहना है कि अपनी नेतागिरी चमकाने के लिए जिस तरह उनके शांत देवस्थलों को अशांत किया जा रहा है और रूढ़ि-परंपरा के नाम पर ढोंग रचा जा रहा है,
उससे स्वयं प्रकृति और उनके आदि-देवता भी
अत्यंत रुष्ट (नाखुश) हैं।
हाल ही में आंदोलनकारियों पर हुआ मधुमक्खियों का भीषण हमला कोई सामान्य या
आकस्मिक घटना नहीं है, बल्कि
जनजातीय दर्शन के अनुसार यह इस राजनैतिक कोलाहल और पवित्र परंपराओं के उल्लंघन पर
प्रकृति का एक सीधा, कड़ा
और साफ संदेश है।
पवित्र गोंड प्रथा की सात्विकता बनाम
राजनैतिक स्वांग
प्राचीन काल से चली आ रही गोंड संस्कृति
के उन मूल तत्वों और मर्यादाओं का विस्तृत विवरण नीचे दिया गया है, जिन्हें आज राजनीतिक रोटियां सेकने के
लिए विकृत किया जा रहा है और जिसके कारण लोक-आस्था आहत हुई है:
सात्विकता का नियम और 'बलि प्रथा' का निषेध
गोंड दर्शन पूरी तरह से प्रकृति की
रक्षा और जीव मात्र के प्रति दया पर आधारित है। बाहरी ताकतों द्वारा अक्सर आदिवासी
समाज को उग्र या हिंसक दिखाने की कोशिश की जाती है, लेकिन हकीकत इसके ठीक उलट है।
परंपरा
का सच: वास्तविक
और पारंपरिक गोंड प्रथा में मनमाने ढंग से दी जाने वाली बलि प्रथा का हमेशा से कड़ा निषेध रहा है। हमारे पूर्वज
मानते आए हैं कि प्रकृति के देव कभी भी निर्दोष जीवों के रक्त से प्रसन्न नहीं
होते।
जल
की परम पवित्रता: गोंड समाज में जल को जीवन का साक्षात
आधार और साक्षात देवता माना गया है। हमारी अटूट परंपरा रही है कि जल स्रोतों को
दूषित होने से बचाने और उनकी पवित्रता बनाए रखने के लिए उसमें कभी भी खून या कोई भी अशुद्ध चीज
नहीं डाली जाती।
लेकिन आज कुछ उग्र तत्वों द्वारा व्यवस्था को चुनौती देने के लिए परंपरा के नाम पर
जिन हिंसक और मनमाने तौर-तरीकों का प्रदर्शन किया जा रहा है, वह मूल गोंड दर्शन का सरासर अपमान है।
देवस्थलों का मौन और एकांतता की
वैज्ञानिकता
आदिवासियों के पेन-ठाना (देवस्थल) या
बूढ़ादेव स्थल कभी भी कोलाहल, भीड़तंत्र
या राजनीति के केंद्र नहीं रहे हैं।
शांत
वातावरण: हमारे
पूर्वजों की यह वैज्ञानिक और आध्यात्मिक समझ थी कि आदिवासियों के पारंपरिक देवस्थल
हमेशा गांव
से दूर, घने
जंगलों के बीच, एकांत
और शांत स्थानों पर होते हैं। ऐसा इसलिए किया जाता था ताकि
वहां की प्राकृतिक और आध्यात्मिक ऊर्जा (Spiritual Energy) अक्षुण्ण बनी रहे और मनुष्य वहां जाकर
आत्मिक शांति पा सके।
राजनीतिक
अखाड़ा: दुर्भाग्य
से, आज इन अलगाववादी
नेताओं ने देवस्थलों को राजनीतिक अखाड़ा बना दिया है। जहां मौन, श्रद्धा और ध्यान होना चाहिए, वहां लाउडस्पीकर बजाए जा रहे हैं,
उग्र भाषण दिए जा रहे हैं और समाज को
बांटने वाले नारे लगाए जा रहे हैं। मधुमक्खियों का उग्र होना (जिन्हें वनों में
देव-शक्तियों का पहरेदार माना जाता है) इसी मर्यादा के टूटने का सीधा परिणाम है।
'देव आने' की पावन अवस्था का राजनैतिक दुरुपयोग
गोंड समाज में 'देव आना' (जब किसी बैगा, गायता या पुजारी के शरीर में देव शक्ति
का संचार होता है) एक अत्यंत गंभीर, पवित्र और पूजनीय घटना मानी जाती है।
हमारी
परंपरा मानती है कि यह अवस्था अत्यंत पवित्र, निष्पाप और सात्विक रूप में होती है। जब
कोई व्यक्ति पूरी तरह शुद्ध मन से बैठता है, तभी सत्य परिणाम दायी होते हैं और समाज
के कल्याण के मार्ग खुलते हैं।












.jpg)

