भारत में बुनियादी बैंक खाता रखने के मामले में महिलाओं और पुरुषों के बीच का लैंगिक अंतर लगभग खत्म हो गया है, लेकिन डिजिटल वित्तीय सेवाओं के इस्तेमाल में महिलाएं अभी भी पुरुषों से काफी पीछे हैं। यह जानकारी अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) और राष्ट्रीय अनुप्रयुक्त आर्थिक अनुसंधान परिषद (NCAER) के संयुक्त नीति पत्र में सामने आई है।
‘Advancing Women’s Digital Financial Inclusion in the Platform Economy’ शीर्षक वाले नीति पत्र के अनुसार, भारत में महिलाओं के बैंक खाता स्वामित्व की दर 2014 में करीब 43 प्रतिशत से बढ़कर 2024 में लगभग 89 प्रतिशत हो गई। वहीं, पुरुषों में बैंक खाता स्वामित्व 2014 के करीब 62 प्रतिशत से बढ़कर 2024 में लगभग 88 प्रतिशत हो गया।
हालांकि, रिपोर्ट के अनुसार पारंपरिक बैंक खातों तक पहुंच में हुई इस प्रगति का असर डिजिटल वित्तीय सेवाओं के स्वतंत्र इस्तेमाल की क्षमता में समान रूप से नहीं दिखा है।
नीति पत्र में कहा गया कि पारंपरिक बैंक खाता स्वामित्व में लैंगिक समानता हासिल करने में भारत की सफलता अभी डिजिटल माध्यम से उपलब्ध वित्तीय सेवाओं में दोहराई नहीं गई है।
Comprehensive Annual Modular Survey 2022-23 के आंकड़ों के अनुसार, 15 वर्ष और उससे अधिक उम्र की केवल 25.2 प्रतिशत महिलाएं ऑनलाइन बैंकिंग लेनदेन कर सकती थीं, जबकि पुरुषों में यह आंकड़ा 47.1 प्रतिशत था। यानी करीब 22 प्रतिशत अंक का अंतर बना हुआ है।
ग्रामीण भारत में यह अंतर और अधिक व्यापक था। वहां केवल 17.1 प्रतिशत महिलाएं ऑनलाइन बैंकिंग कर सकती थीं, जबकि पुरुषों में यह आंकड़ा 39.2 प्रतिशत था।
इंटरनेट पर जानकारी खोजने, ईमेल का इस्तेमाल करने और ऑनलाइन बैंकिंग करने की क्षमता को एक साथ देखने पर भी अंतर सामने आया। केवल 18 प्रतिशत महिलाएं इन तीनों डिजिटल कौशल में सक्षम थीं, जबकि पुरुषों में यह आंकड़ा 30.1 प्रतिशत था।
रिपोर्ट ने मोबाइल मनी के इस्तेमाल में भी बड़े अंतर को रेखांकित किया। 2024 में भारत में 32 प्रतिशत पुरुषों के पास मोबाइल मनी अकाउंट था, जबकि महिलाओं में यह आंकड़ा केवल 14 प्रतिशत था। इस तरह लैंगिक अंतर 18 प्रतिशत अंक रहा, जो वैश्विक स्तर पर छह प्रतिशत अंक के अंतर से तीन गुना अधिक है।
यह अंतर ऐसे समय में महत्वपूर्ण है जब भारत की प्लेटफॉर्म अर्थव्यवस्था तेजी से विस्तार कर रही है। रिपोर्ट के अनुसार, देश में प्लेटफॉर्म वर्कर्स की संख्या 2020 में अनुमानित 77 लाख से बढ़कर वित्त वर्ष 2025 में 1.2 करोड़ हो गई और 2029-30 तक इसके 2.35 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है। रिपोर्ट ने इसके लिए आर्थिक सर्वेक्षण और नीति आयोग के अनुमानों का हवाला दिया।
नीति पत्र के अनुसार, कौशल और डिजिटल साक्षरता की कमी, आवाजाही और सुरक्षा संबंधी चिंताएं, प्रतिबंधात्मक सामाजिक मानदंड और वित्तीय सेवाओं तक सीमित पहुंच जैसी कई बाधाओं के कारण प्लेटफॉर्म अर्थव्यवस्था में महिलाओं की भागीदारी कम बनी हुई है।
रिपोर्ट में कहा गया कि वित्तीय समावेशन का लक्ष्य केवल बैंक खाते खोलने तक सीमित नहीं होना चाहिए। महिलाओं को भुगतान, बचत, ऋण और बीमा जैसी वित्तीय सेवाओं का स्वतंत्र और स्थायी रूप से इस्तेमाल करने में सक्षम बनाना भी जरूरी है।















