स्वास्थ्य सेवा मनुष्य के जीवन की सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकताओं में से एक है। बीमारी के समय व्यक्ति डॉक्टर, अस्पताल, नर्स, जांच केंद्र, दवाओं और पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था पर भरोसा करता है। उसकी अपेक्षा होती है कि उपचार से स्वास्थ्य बेहतर होगा और उसे किसी अतिरिक्त नुकसान का सामना नहीं करना पड़ेगा। लेकिन आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं के बावजूद गलत निदान, दवा संबंधी त्रुटि, संक्रमण, उपचार में देरी या स्वास्थ्य कर्मियों के बीच संवाद की कमी जैसी स्थितियां मरीज की सुरक्षा के लिए चुनौती बन सकती हैं। इसलिए रोगी सुरक्षा आज वैश्विक स्वास्थ्य व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार स्वास्थ्य सेवाओं के दौरान लगभग हर 10 में से एक मरीज को किसी न किसी प्रकार का नुकसान पहुंचता है और इनमें से करीब आधे मामलों को रोकने योग्य माना गया है। असुरक्षित स्वास्थ्य देखभाल से होने वाली क्षति का सामाजिक और आर्थिक प्रभाव भी व्यापक है। इससे स्पष्ट होता है कि रोगी सुरक्षा केवल अस्पताल की आंतरिक व्यवस्था नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य और गुणवत्तापूर्ण चिकित्सा सेवा का महत्वपूर्ण आधार है।
इसी उद्देश्य से हर वर्ष 17 सितंबर को विश्व रोगी सुरक्षा दिवस मनाया जाता है। वर्ष 2019 में विश्व स्वास्थ्य सभा ने रोगी सुरक्षा को वैश्विक स्वास्थ्य प्राथमिकता के रूप में स्वीकार किया और इस दिवस की शुरुआत हुई। वर्ष 2026 की थीम “Safe care for noncommunicable diseases” यानी “गैर-संचारी रोगों के लिए सुरक्षित देखभाल” है, जबकि संदेश “Safe care for life!” है। हृदय रोग, कैंसर, मधुमेह और दीर्घकालिक श्वसन रोगों में मरीज को लंबे समय तक उपचार, जांच और निगरानी की जरूरत होती है। इसलिए इन रोगों की रोकथाम से लेकर निदान, उपचार और फॉलो-अप तक हर चरण को सुरक्षित बनाना ही रोगी सुरक्षा की वास्तविक कसौटी है।
रोगी सुरक्षा का वास्तविक अर्थ
रोगी सुरक्षा का सामान्य अर्थ है स्वास्थ्य सेवा प्राप्त करते समय मरीज को ऐसी अनावश्यक क्षति से बचाना जिसे उचित व्यवस्था और सावधानी से रोका जा सकता है। इसका संबंध केवल ऑपरेशन या अस्पताल में भर्ती मरीज से नहीं है। डॉक्टर से पहली मुलाकात, जांच, निदान, दवा लिखने, दवा लेने, घर पर देखभाल, फॉलो-अप और पुनर्वास तक हर चरण में सुरक्षा महत्वपूर्ण है। रोगी सुरक्षा का उद्देश्य डॉक्टर या किसी स्वास्थ्यकर्मी को दोषी ठहराना नहीं, बल्कि ऐसी स्वास्थ्य व्यवस्था विकसित करना है, जिसमें गलती की संभावना कम से कम हो। विश्व स्वास्थ्य संगठन भी सुरक्षित स्वास्थ्य सेवा के लिए ऐसी प्रणालियां विकसित करने पर जोर देता है जो जोखिमों की पहचान करें, घटनाओं से सीखें और भविष्य में नुकसान को रोकें। इस दृष्टि से रोगी सुरक्षा को केवल व्यक्तिगत सावधानी के बजाय व्यवस्थागत जिम्मेदारी के रूप में समझना आवश्यक है। एक सुरक्षित अस्पताल वह नहीं है जहां कभी कोई गलती न हो, बल्कि वह है जहां संभावित गलती को पहले से पहचानने, उसकी सूचना देने, कारण समझने और दोबारा होने से रोकने की व्यवस्था मौजूद हो।
17 सितंबर को ही क्यों मनाया जाता है विश्व रोगी सुरक्षा दिवस
विश्व रोगी सुरक्षा दिवस की शुरुआत 2019 में हुई। विश्व स्वास्थ्य सभा के प्रस्ताव WHA72.6 के माध्यम से रोगी सुरक्षा को वैश्विक स्वास्थ्य प्राथमिकता के रूप में मान्यता दी गई और प्रत्येक वर्ष 17 सितंबर को यह दिवस मनाने का निर्णय लिया गया। इसका उद्देश्य दुनिया भर में रोगी सुरक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ाना, स्वास्थ्य सेवाओं में होने वाली टाली जा सकने वाली क्षति को कम करना और सरकारों, स्वास्थ्य संस्थानों, स्वास्थ्यकर्मियों, मरीजों तथा समुदायों को एक साझा प्रयास से जोड़ना है। वर्ष 2021 में WHO ने Global Patient Safety Action Plan 2021–2030 को अपनाया। इसका व्यापक उद्देश्य स्वास्थ्य सेवाओं में होने वाली टाली जा सकने वाली क्षति को कम करना और ऐसी स्वास्थ्य प्रणालियां बनाना है जो सुरक्षित, लचीली और मरीज-केंद्रित हों। इस तरह विश्व रोगी सुरक्षा दिवस किसी एक दिन की औपचारिक गतिविधि नहीं, बल्कि पूरे वर्ष स्वास्थ्य व्यवस्था में सुरक्षा सुधारने की वैश्विक पहल का हिस्सा है।
2026 की थीम और गैर-संचारी रोगों पर विशेष ध्यान
वर्ष 2026 की थीम को समझने के लिए गैर-संचारी रोगों की प्रकृति को समझना जरूरी है। हृदय रोग, स्ट्रोक, कैंसर, मधुमेह और क्रॉनिक रेस्पिरेटरी डिजीज जैसे रोग लंबे समय तक बने रह सकते हैं। WHO के अनुसार गैर-संचारी रोग दुनिया भर में होने वाली लगभग 74 प्रतिशत मौतों से जुड़े हैं और इनसे प्रभावित लोगों को अक्सर जीवन के लंबे हिस्से में स्वास्थ्य सेवाओं की जरूरत होती है। ऐसे मरीजों के लिए सुरक्षा का अर्थ केवल सही दवा देना नहीं है। उन्हें समय पर जांच, सही निदान, नियमित निगरानी, दवाओं का समुचित प्रबंधन, अलग-अलग चिकित्सकों के बीच सही जानकारी का आदान-प्रदान और जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ सेवाओं तक पहुंच भी चाहिए। मसलन, मधुमेह से पीड़ित व्यक्ति को वर्षों तक रक्त शर्करा की निगरानी, दवा, आहार संबंधी सलाह और नियमित जांच की जरूरत हो सकती है। यदि उसकी दवाओं में बदलाव की जानकारी अगले चिकित्सक तक सही तरीके से न पहुंचे, जांच रिपोर्ट का उचित मूल्यांकन न हो या मरीज को दवा के सही इस्तेमाल की जानकारी न हो, तो उपचार में जोखिम पैदा हो सकता है। यही कारण है कि 2026 का अभियान सुरक्षित देखभाल को बीमारी के पूरे जीवन-चक्र से जोड़ता है।
निदान में सुरक्षा की पहली शर्त
सही उपचार की शुरुआत सही निदान से होती है। बीमारी की पहचान में देरी, लक्षणों की गलत व्याख्या, जांच रिपोर्ट के संचार में कमी या मरीज की पिछली चिकित्सा जानकारी उपलब्ध न होने जैसी परिस्थितियां उपचार को प्रभावित कर सकती हैं। गैर-संचारी रोगों में यह चुनौती और महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि कई बार अलग-अलग बीमारियों के लक्षण एक-दूसरे से मिलते-जुलते हो सकते हैं। उम्र बढ़ने के साथ एक ही व्यक्ति में एक से अधिक स्वास्थ्य समस्याएं भी हो सकती हैं। इसलिए सुरक्षित निदान के लिए मरीज की पूरी चिकित्सा जानकारी, उचित जांच, प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मी और समय पर रिपोर्ट की समीक्षा आवश्यक है। डिजिटल स्वास्थ्य रिकॉर्ड और आधुनिक जांच तकनीक इस प्रक्रिया को मजबूत कर सकती हैं, लेकिन तकनीक के साथ मानवीय विवेक और चिकित्सकीय विशेषज्ञता भी उतनी ही जरूरी है।
दवा सुरक्षा : छोटी गलती का बड़ा असर
रोगी सुरक्षा में दवा का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। गलत दवा, गलत खुराक, गलत समय या दवाओं के बीच संभावित प्रतिकूल प्रभावों की अनदेखी से मरीज को नुकसान हो सकता है। WHO के अनुसार दवा संबंधी नुकसान रोगी सुरक्षा की प्रमुख चिंताओं में शामिल है। यह समस्या उन मरीजों में अधिक जटिल हो सकती है जो लंबे समय से कई दवाएं ले रहे हैं। ऐसे मामलों में डॉक्टर, फार्मासिस्ट और मरीज के बीच स्पष्ट संवाद आवश्यक है। मरीज को अपनी सभी दवाओं की सूची रखना, बिना चिकित्सकीय सलाह के दवा बंद या शुरू न करना और दवा के बारे में किसी भी संदेह को तुरंत पूछना चाहिए। दूसरी ओर स्वास्थ्य व्यवस्था की जिम्मेदारी है कि दवा लिखने, उपलब्ध कराने और उसके इस्तेमाल की जानकारी देने की प्रक्रिया में स्पष्टता और सुरक्षा बनी रहे।
संक्रमण से बचाव भी रोगी सुरक्षा का हिस्सा
अस्पताल में भर्ती मरीज पहले से ही बीमारी या कमजोरी से जूझ रहा होता है। ऐसे में स्वास्थ्य सेवा से जुड़े संक्रमण उसकी स्थिति को और गंभीर बना सकते हैं। हाथों की स्वच्छता, उपकरणों की उचित सफाई, संक्रमण नियंत्रण प्रोटोकॉल और सुरक्षित प्रक्रियाओं का पालन इस जोखिम को कम करने के महत्वपूर्ण उपाय हैं। रोगी सुरक्षा की यह अवधारणा अस्पताल की चारदीवारी से बाहर भी लागू होती है। घर पर घाव की देखभाल, दवा रखने और इस्तेमाल करने की सही प्रक्रिया तथा स्वच्छता संबंधी सावधानियां भी उपचार की सुरक्षा से जुड़ी हैं।
प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल की भूमिका
रोगी सुरक्षा को केवल बड़े अस्पतालों तक सीमित रखना पर्याप्त नहीं है। सुरक्षित स्वास्थ्य व्यवस्था की मजबूत नींव प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल में तैयार होती है। समय पर स्क्रीनिंग, शुरुआती पहचान, स्वास्थ्य संबंधी परामर्श और नियमित निगरानी से कई जटिलताओं को कम किया जा सकता है। WHO ने 2026 के अभियान में गैर-संचारी रोगों की सुरक्षित देखभाल के लिए प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल आधारित स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करने पर विशेष जोर दिया है। यदि किसी मरीज को उसके स्थानीय स्वास्थ्य केंद्र पर नियमित और गुणवत्तापूर्ण सेवा मिलती रहे तो छोटी समस्या के गंभीर रूप लेने की संभावना कम की जा सकती है। इसके लिए प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में प्रशिक्षित कर्मियों, आवश्यक दवाओं, जांच सुविधाओं और बेहतर रेफरल व्यवस्था की जरूरत है।
मरीज केवल उपचार पाने वाला नहीं, भागीदार भी है
रोगी सुरक्षा की आधुनिक अवधारणा में मरीज की भूमिका लगातार महत्वपूर्ण हुई है। मरीज को अपने उपचार के बारे में सवाल पूछने, अपनी बीमारी और दवाओं को समझने तथा अपनी चिंताओं को स्वास्थ्यकर्मी के सामने रखने का अवसर मिलना चाहिए। WHO ने भी मरीजों और उनके परिवारों को स्वास्थ्य सेवा की सुरक्षा व्यवस्था में सक्रिय भागीदार बनाने पर जोर दिया है। 2026 के अभियान में गैर-संचारी रोगों के साथ जीवन जी रहे लोगों को सुरक्षा संबंधी समाधान तैयार करने की प्रक्रिया में शामिल करने की बात कही गई है। इसका अर्थ यह है कि मरीज की अपनी जीवन-स्थितियों और अनुभवों को भी उपचार व्यवस्था में महत्व दिया जाए। वह केवल बीमारी का नाम या मेडिकल रिकॉर्ड संख्या नहीं, बल्कि अपनी परिस्थितियों, जरूरतों और अनुभवों वाला व्यक्ति है।
परिवार और देखभालकर्ताओं की जिम्मेदारी
दीर्घकालिक रोगों में परिवार की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो जाती है। बुजुर्गों, गंभीर रोगियों और ऐसे मरीजों के लिए जिन्हें नियमित दवा या निगरानी की आवश्यकता होती है, परिवार अक्सर उपचार व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बन जाता है। दवाओं का समय पर याद दिलाना, डॉक्टर की सलाह को समझना, जांच की तारीखों का ध्यान रखना और मरीज की स्थिति में असामान्य बदलाव होने पर समय पर चिकित्सकीय सहायता लेना परिवार की भूमिका का हिस्सा हो सकता है। लेकिन परिवार को चिकित्सकीय निर्णय का स्थान नहीं लेना चाहिए। उसकी भूमिका मरीज और स्वास्थ्य व्यवस्था के बीच सहयोग को मजबूत करने की होनी चाहिए।
स्वास्थ्य साक्षरता से मजबूत होगी सुरक्षा
स्वास्थ्य साक्षरता रोगी सुरक्षा की आधारभूत आवश्यकता है। यदि मरीज को यह पता ही न हो कि कौन-सी दवा किसलिए है, जांच क्यों कराई जा रही है या डॉक्टर की सलाह का पालन कैसे करना है, तो उपचार की सुरक्षा प्रभावित हो सकती है। आज इंटरनेट और सोशल मीडिया ने स्वास्थ्य संबंधी जानकारी तक पहुंच आसान बना दी है। इसके साथ गलत और अधूरी जानकारी का प्रसार भी बढ़ा है। इसलिए किसी भी स्वास्थ्य सूचना को बिना सत्यापन के उपचार का आधार बनाना उचित नहीं है। स्वास्थ्य साक्षरता का अर्थ केवल बीमारी का नाम जानना नहीं, बल्कि विश्वसनीय स्रोतों से सही जानकारी प्राप्त करना और उसे अपनी स्थिति के अनुसार चिकित्सकीय सलाह के साथ समझना है।
स्वास्थ्य कर्मियों की कार्य-स्थितियां भी महत्वपूर्ण
सुरक्षित स्वास्थ्य सेवा के लिए डॉक्टरों, नर्सों, फार्मासिस्टों, तकनीशियनों और अन्य स्वास्थ्य कर्मियों को पर्याप्त प्रशिक्षण और सहयोग मिलना जरूरी है। अत्यधिक कार्यभार, थकान, कर्मचारियों की कमी और कमजोर संचार व्यवस्था सुरक्षा को प्रभावित कर सकती है। इसलिए रोगी सुरक्षा की चर्चा करते समय स्वास्थ्य कर्मियों की सुरक्षा और कल्याण को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। एक ऐसा कार्यस्थल जहां कर्मचारी अपनी चिंता या संभावित गलती की जानकारी बिना भय के दे सकें, सीखने और सुधार की संस्कृति को मजबूत करता है।
गलती छिपाने के बजाय उससे सीखने की संस्कृति
स्वास्थ्य सेवा में किसी प्रतिकूल घटना के बाद केवल यह पूछना कि गलती किससे हुई, समस्या का पूरा समाधान नहीं देता। यह भी समझना जरूरी है कि गलती की परिस्थितियां कैसे बनीं। क्या जानकारी समय पर उपलब्ध नहीं थी? क्या दो विभागों के बीच संवाद में कमी थी? क्या कार्यप्रणाली अस्पष्ट थी? क्या कर्मचारियों को पर्याप्त प्रशिक्षण मिला था? क्या आवश्यक संसाधन उपलब्ध थे? इन सवालों के जवाब से स्वास्थ्य संस्थान अपनी व्यवस्था को बेहतर बना सकते हैं। WHO भी रोगी सुरक्षा में घटनाओं से सीखने और व्यवस्थागत सुधार पर जोर देता है।
डिजिटल स्वास्थ्य और कृत्रिम बुद्धिमत्ता की नई संभावनाएं
तकनीक ने स्वास्थ्य सेवाओं में नई संभावनाएं पैदा की हैं। इलेक्ट्रॉनिक स्वास्थ्य रिकॉर्ड मरीज की पुरानी जानकारी को व्यवस्थित रखने में मदद कर सकते हैं। डिजिटल रिमाइंडर नियमित दवा और फॉलो-अप में उपयोगी हो सकते हैं। टेलीमेडिसिन से दूरदराज के मरीज विशेषज्ञों तक पहुंच बना सकते हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित प्रणालियां जांच और चिकित्सकीय निर्णय में सहायक हो सकती हैं। लेकिन तकनीक अपने आप में त्रुटिरहित नहीं है। गलत या अधूरे डेटा, गोपनीयता, साइबर सुरक्षा और एल्गोरिदम की सीमाओं पर भी ध्यान देना होगा। इसलिए डिजिटल स्वास्थ्य का लक्ष्य मानव चिकित्सकीय निर्णय को समाप्त करना नहीं, बल्कि उसे अधिक सुरक्षित और प्रभावी बनाने में सहायता करना होना चाहिए।
भारत के संदर्भ में रोगी सुरक्षा
भारत जैसे विशाल और विविधता वाले देश में रोगी सुरक्षा की चुनौती कई स्तरों पर दिखाई देती है। महानगरों में अत्याधुनिक अस्पतालों और डिजिटल स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार हो रहा है, वहीं कई ग्रामीण और दूरदराज क्षेत्रों में विशेषज्ञ सेवाओं और जांच सुविधाओं तक पहुंच अभी भी चुनौतीपूर्ण हो सकती है। आर्थिक स्थिति, भौगोलिक दूरी, स्वास्थ्य साक्षरता, भाषा और सामाजिक परिस्थितियां भी स्वास्थ्य सेवा तक पहुंच और उसके परिणामों को प्रभावित कर सकती हैं। इसलिए भारत में रोगी सुरक्षा का अर्थ केवल अस्पतालों में सुरक्षा प्रोटोकॉल लागू करना नहीं, बल्कि स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक सुलभ, समन्वित और व्यक्ति-केंद्रित बनाना भी है। प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करना, समय पर रेफरल, आवश्यक दवाओं और जांच की उपलब्धता तथा डिजिटल स्वास्थ्य ढांचे का जिम्मेदार उपयोग इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकते हैं।
आर्थिक सुरक्षा भी स्वास्थ्य सुरक्षा का हिस्सा
कई बार बीमारी का उपचार इसलिए बाधित हो जाता है क्योंकि मरीज लगातार होने वाले खर्च का सामना नहीं कर पाता। गैर-संचारी रोगों के मामले में यह चुनौती विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि उपचार लंबा चल सकता है। यदि मरीज दवा या नियमित जांच का खर्च नहीं उठा पाता और उपचार बीच में रुक जाता है तो उसकी स्वास्थ्य स्थिति प्रभावित हो सकती है। इसलिए सुरक्षित स्वास्थ्य व्यवस्था में आर्थिक पहुंच को भी महत्व देना आवश्यक है। WHO के 2026 अभियान में भी गैर-संचारी रोगों की सुरक्षित देखभाल के लिए स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच और व्यापक स्वास्थ्य निर्धारकों पर ध्यान देने की आवश्यकता रेखांकित की गई है।
रोगी सुरक्षा और मानव गरिमा
चिकित्सा सुरक्षा का संबंध केवल मशीनों, दवाओं और प्रोटोकॉल से नहीं है। मरीज की गरिमा, निजता, सहमति और सम्मान भी सुरक्षित स्वास्थ्य सेवा का हिस्सा हैं। बीमारी की स्थिति में व्यक्ति अक्सर मानसिक और शारीरिक रूप से कमजोर होता है। ऐसे समय में उसके साथ सम्मानजनक संवाद, उसकी बात ध्यान से सुनना और उपचार से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी स्पष्ट रूप से देना चिकित्सा व्यवस्था में विश्वास को मजबूत करता है। सुरक्षित स्वास्थ्य सेवा वही है जिसमें आधुनिक तकनीक और मानवीय संवेदना दोनों साथ चलें।
स्वास्थ्य व्यवस्था को मरीज के सफर के रूप में देखना होगा
रोगी सुरक्षा को समझने का सबसे प्रभावी तरीका मरीज की पूरी स्वास्थ्य यात्रा को देखना है। यह यात्रा बीमारी से बचाव से शुरू होकर स्क्रीनिंग, निदान, उपचार, दवा, नियमित निगरानी, पुनर्वास और जरूरत पड़ने पर पेलिएटिव केयर तक जाती है। गैर-संचारी रोगों में यह यात्रा कई वर्षों तक चल सकती है। इसलिए यदि किसी एक चरण में जानकारी का प्रवाह टूटता है या उपचार का समन्वय कमजोर पड़ता है तो उसका असर आगे के चरणों पर भी हो सकता है। WHO का 2026 अभियान इसी कारण सुरक्षित देखभाल को पूरे continuum of care से जोड़ता है। इस दृष्टिकोण में अस्पताल, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, प्रयोगशाला, फार्मेसी, परिवार और स्वयं मरीज एक-दूसरे से जुड़े हिस्से बन जाते हैं।
आंकड़ों से बनेगी बेहतर सुरक्षा व्यवस्था
रोगी सुरक्षा सुधारने के लिए केवल अनुभव या अनुमान पर्याप्त नहीं हैं। स्वास्थ्य संस्थानों को प्रतिकूल घटनाओं और संभावित जोखिमों की व्यवस्थित पहचान और रिपोर्टिंग करनी चाहिए। किस प्रकार की गलती बार-बार हो रही है, किन प्रक्रियाओं में जोखिम अधिक है और किन परिस्थितियों में मरीजों को नुकसान पहुंचता है। इन सवालों के आंकड़ों के आधार पर उत्तर खोजे जा सकते हैं। WHO के अनुसार असुरक्षित स्वास्थ्य देखभाल का आर्थिक और सामाजिक बोझ भी बहुत बड़ा है। मरीज की बीमारी बढ़ने से परिवार पर अतिरिक्त खर्च पड़ता है और कार्यक्षमता प्रभावित होती है। इसलिए रोगी सुरक्षा में निवेश केवल स्वास्थ्य सेवा सुधारने का उपाय नहीं, बल्कि आर्थिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण कदम है।
वैश्विक सहयोग की आवश्यकता
रोगी सुरक्षा किसी एक देश की समस्या नहीं है। स्वास्थ्य सेवाओं में गलत दवा, संक्रमण, निदान संबंधी त्रुटि और समन्वय की कमी जैसी चुनौतियां अलग-अलग देशों में अलग रूपों में सामने आ सकती हैं। इसीलिए WHO वैश्विक स्तर पर देशों को सुरक्षित स्वास्थ्य प्रणालियां विकसित करने, अनुभव साझा करने और मरीजों तथा परिवारों की भागीदारी बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित करता है। Global Patient Safety Action Plan 2021–2030 इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण वैश्विक ढांचा है। वैश्विक सहयोग का वास्तविक उद्देश्य समान मॉडल थोपना नहीं, बल्कि विभिन्न देशों के अनुभवों से सीखकर स्थानीय जरूरतों के अनुसार प्रभावी सुरक्षा व्यवस्था विकसित करना होना चाहिए।
सुरक्षित स्वास्थ्य सेवा का लें संकल्प
विश्व रोगी सुरक्षा दिवस हमें याद दिलाता है कि स्वास्थ्य सेवा की सफलता केवल इस बात से नहीं मापी जा सकती कि कितने मरीजों का इलाज हुआ, बल्कि यह भी महत्वपूर्ण है कि उपचार के दौरान उनकी सुरक्षा, गरिमा और विश्वास कितना कायम रहा। वर्ष 2026 की थीम “Safe care for noncommunicable diseases” और संदेश “Safe care for life!” गैर-संचारी रोगों से जूझ रहे लोगों के लिए सुरक्षित और निरंतर देखभाल की आवश्यकता को रेखांकित करते हैं। हृदय रोग, कैंसर, मधुमेह और दीर्घकालिक श्वसन रोगों में उपचार लंबे समय तक चलता है। इसलिए सही निदान, सुरक्षित दवा, संक्रमण नियंत्रण, प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मी, मजबूत प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएं और मरीज की सक्रिय भागीदारी जरूरी है।
स्वास्थ्य व्यवस्था में ऐसी संस्कृति विकसित करनी होगी, जिसमें गलती होने के बाद केवल जिम्मेदारी तय करने के बजाय उसके कारणों को समझकर भविष्य के जोखिम कम किए जाएं। मरीज और परिवार की आवाज सुनी जाए, स्वास्थ्य कर्मियों को जोखिम बताने के लिए सुरक्षित वातावरण मिले और डिजिटल तकनीक का जिम्मेदारी से उपयोग हो। अंततः चिकित्सा का उद्देश्य केवल बीमारी का उपचार नहीं, बल्कि जीवन और उसकी गुणवत्ता की रक्षा करना है। सुरक्षित उपचार, सही जानकारी, समय पर देखभाल और मानवीय संवेदना ही भरोसेमंद स्वास्थ्य व्यवस्था की आधारशिला हैं। स्वास्थ्य अनमोल धन है। चिकित्सा शिक्षा और दवा निर्माण में गुणवत्ता ही दीर्घकाल में मरीजों की सुरक्षा सुनिश्चित कर सकती है। यह आलेख सफदरजंग अस्पताल के मेडिसिन विभाग के सीनियर प्रोफेसर डॉ अश्वनी राय से हुई विस्तृत बातचीत और उनके लम्बे चिकित्सकीय अनुभव के आधार पर तैयार किया गया है।















