भारतीय सिनेमा में सस्पेंस और थ्रिलर की
नयी परिभाषा गढ़ने वाली फ्रेंचाइजी फिल्म दृश्यम अपने तीसरे और निर्णायक मोड़ तक आ
पहुंची है. आज रिलीज हुई दृश्यम द कंक्लूजन इस बार सुपरस्टार मोहनलाल की मलयालम
फिल्म का रीमेक नहीं है बल्कि ओरिजिनल कहानी पर आधारित है. क्या यह ओरिजिनल कहानी
पिछले दोनों हिस्सों की तरह रहस्य और रोमांच से भरपूर है या गयी है चूक. जानने के
लिए पढ़े यह रिव्यु
ये है कहानी
पिछले पार्ट में कहानी जहां खत्म हुई थी. वहां से छह महीने आगे बढ़
चुकी है.देखमुख परिवार किसी तरह से अपने बेटे सैम की मौत से उबरने की कोशिश कर रहा
है,लेकिन मीरा (तब्बू )को सुकून नहीं मिल रहा
है.आख़िरकार वह तय कर लेती है कि वह अपने बेटे के लिए न्याय नहीं अब बदला
लेगी.जिसमें उसका साथ क्राइम ब्रांच एसपी राजवीर तोमर (जयदीप अहलावत )और वकील
शेट्टी (प्रकाश राज )देते हैं.राजवीर का दावा है कि उसके हाथ कुछ ऐसे सबूत
हैं.जिनसे विजय सालगावंकर और उसका परिवार नहीं बच सकता है.क्या इस बार कानून के
शिकंजे में होगा सालगांवकर परिवार या इस बार विजय अपने परिवार को हमेशा के लिए बचा
लेगा. यह जानने के लिए आपको सिनेमाघर का रुख करना होगा.
इस बार 2 अक्टूबर नहीं 23 जुलाई में
पेंच
अजय देवगन की इस फिल्म की आखिरी क़िस्त ओरिजिनल है. ओरिजिनल कहानी
और इस पॉपुलर फ्रेंचाइजी को एन्ड करने की नयी पहल के लिए इसकी पूरी टीम सबसे पहले
बधाई की पात्र है.आमतौर पर जहाँ हिंदी सिनेमा फ्रेंचाइजी फिल्मों को भुनाने का एक
भी मौक़ा नहीं छोड़ता है. वहीँ दृश्यम जैसी कल्ट फ्रेंचाइजी को उसके अंजाम तक पहुंचा
दिया गया है.अब फिल्म की ओरिजिनल स्क्रिप्ट पर आते हैं.निर्देशक अभिषेक ने परवीज
शेख और आमिल कियान खान के साथ मिलकर फिल्म की कहानी और स्क्रीनप्ले लिखी है. जो
एंगेजिंग के साथ साथ एंटरटेनिंग है. दर्शक देखमुख और सालगांवकर परिवार से परिचित
हैं इसलिए फिल्म की शुरुआत होते ही आप उससे जुड़ जाते हैं. फिल्म ट्विस्ट एंड टर्न
से भरी हुई है. जो कई बार सरप्राइज करते हैं तो कई बार कनविनिएंट वाला रास्ता भी
इख्तियार करते हैं लेकिन ये तय है कि फिल्म आपको बांधे रखती है.आपको ये डर लगा
रहता है कि विजय इस बार कहीं कोई गलती ना कर दे.जिससे खेल खत्म. सेकेंड हाफ में
फिल्म आपको पलक झपकने का भी मौक़ा नहीं देती है हालांकि फर्स्ट हाफ के कई दृश्य अहम
हैं क्योंकि वह आखिर के आधे घंटे वाले क्लाइमेक्स के खेल से जुड़े हुए हैं.दृश्यम
का मतलब 2 अक्टूबर अब तक रहा है,लेकिन
इस बार पेंच 23 जुलाई में अटका हुआ है.यह भी स्क्रिप्ट में
बखूबी लाया गया है.फिल्म के संवाद प्रभावी बने हैं.फिल्म का बैकग्राउंड म्यूजिक
फिल्म के असर को बढ़ाता है. कैमरावर्क भी पैनापन लिए हुए हैं.अभिषेक पाठक ने
निर्देशन की जिम्मेदारी को बखूबी संभाला है.फिल्म आखिर में सशक्त तरीके से अपने
शीर्षक को भी बयां कर गयी है कि जो दिखाई देता है.वह हमेशा सच नहीं होता है.
विजुवल भी धोखा दे सकते हैं.
यहां नहीं बनी बात
फिल्म की खामियों की बात करें तो फिल्म का शुरूआती 20 मिनट स्लो है. जो कइयों को अखर सकता है. तब्बू जैसी समर्थ अभिनेत्री से
परदे पर कुछ यादगार की उम्मीद रहती है,लेकिन दृश्यम की इस
आखिरी क़िस्त में उनके लिए कुछ भी यादगार करने को नहीं था.तब्बू का रोल बड़ा होना
चाहिए था.फिल्म में 2 अक्टूबर को क्या हुआ था याद है ना वाला
डायलॉग भी नहीं बोला गया है.जो इस फ्रेंचाइजी के हार्ड कोर फैंस को थोड़ा निराश कर
सकता है.आखिर में अगर आप ये सोचकर इस फिल्म को देखने जा रहे हैं कि यह फिल्म की
आखिरी क़िस्त है और भले ही सेल्फ डिफेंस में ही सही लेकिन क्राइम तो क्राइम होता
है.ऐसा कुछ फिल्म आखिरी में सीख देगी तो यह उम्मीद इस फिल्म से करना बेमानी होगा.















