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(फिल्म समीक्षा: 'प्रेम कीटाणु') हल्की-फुल्की कहानी, लेकिन मनोरंजन में नहीं दिखा दम


मनोरंजन 02 October 2026
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(फिल्म समीक्षा: 'प्रेम कीटाणु') हल्की-फुल्की कहानी, लेकिन मनोरंजन में नहीं दिखा दम

प्यार, दोस्ती, कॉमेडी और परिवार के रिश्तों को मिलाकर बनाई गई 'प्रेम कीटाणु' के पास एक हल्की-फुल्की और मनोरंजक फिल्म बनने का मौका था, लेकिन कमजोर लेखन और बिखरी हुई कहानी के कारण फिल्म अपनी छाप छोड़ने में कामयाब नहीं हो पाती है। फिल्म का विचार नया नहीं है और जिस सहजता की उम्मीद एक रोमांटिक कॉमेडी से की जाती है, वह भी ज्यादातर हिस्सों में नजर नहीं आती।

कहानी

कहानी विशाल की जिंदगी में सुहानी के आने से शुरू होती है। दोनों के बीच नजदीकियां बढ़ती हैं और विशाल इस रिश्ते को लेकर गंभीर नजर आता है। लेकिन सुहानी की अपनी उम्मीदें और सोच हैं। इसके बाद रंजीत की एंट्री कहानी के समीकरण बदलने की कोशिश करती है। फिल्म यहां से प्रेम त्रिकोण के साथ परिवार और दोस्ती को जोड़ती है, लेकिन कई जगह कहानी स्वाभाविक तरीके से आगे बढ़ने के बजाय जबरदस्ती घटनाओं को जोड़ती हुई महसूस होती है। रिश्तों की उलझन को गहराई देने की कोशिश की गई है, लेकिन किरदारों के फैसलों और भावनाओं के पीछे पर्याप्त मजबूत आधार नजर नहीं आता। नतीजतन कहानी दर्शक को भावनात्मक रूप से जोड़ने में असफल रहती है।

निर्देशन और लेखन

अपूर्व सिंह कार्की ने फिल्म का माहौल हल्का रखने की कोशिश की है, लेकिन कमजोर पटकथा उनका साथ नहीं देती। रोमांस, कॉमेडी और पारिवारिक ड्रामा के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कई जगह असंगत लगती है। फिल्म में ऐसे कई मौके आते हैं जहां कहानी को आगे बढ़ाने या किरदारों को बेहतर तरीके से समझाने की जरूरत थी, लेकिन घटनाएं सतही तौर पर आगे बढ़ जाती हैं। कॉमेडी भी लगातार प्रभाव पैदा नहीं कर पाती। जिन दृश्यों से हंसी पैदा होनी चाहिए, उनमें से कई दृश्य सामान्य लगते हैं। रोमांटिक हिस्सों में भी वह भावनात्मक जुड़ाव नहीं बनता जिसकी कहानी को जरूरत थी। फिल्म का सबसे बड़ा कमजोर पक्ष यही है कि यह न तो अच्छी प्रेम कहानी बन पाती है और न ही प्रभावी कॉमेडी।

अभिनय

वीर पहाड़िया ने विशाल के किरदार को सहजता से निभाने की कोशिश की है, लेकिन कमजोर किरदार-लेखन के कारण उनका अभिनय ज्यादा प्रभाव नहीं छोड़ पाता। उनके किरदार की मासूमियत और उलझन पर्दे पर दिखाई देती है, लेकिन उसमें गहराई की कमी महसूस होती है। आफिया सैयद पहली फिल्म में आत्मविश्वास दिखाती हैं, लेकिन उनके किरदार को भी पर्याप्त मजबूत तरीके से नहीं लिखा गया है। वीर के साथ उनकी केमिस्ट्री कुछ जगह ठीक लगती है, लेकिन फिल्म को संभालने के लिए यह पर्याप्त नहीं है। अपारशक्ति खुराना से कॉमेडी के मोर्चे पर काफी उम्मीद रहती है, लेकिन रंजीत के किरदार में उन्हें भी बहुत ज्यादा प्रभावी सामग्री नहीं मिलती। राकेश बेदी और बाकी कलाकार अपने स्तर पर फिल्म को संभालने की कोशिश करते हैं, लेकिन कमजोर पटकथा की सीमाएं साफ नजर आती हैं।

संगीत और तकनीकी पक्ष

'कहो तो', 'तू मेरा रइयो' और 'इश्क का गुलाम' जैसे गाने फिल्म के रोमांटिक माहौल को बनाए रखने की कोशिश करते हैं, लेकिन संगीत कहानी को मजबूत करने में बहुत बड़ी भूमिका नहीं निभा पाता। तकनीकी पक्ष भी सामान्य है। विजुअल ट्रीटमेंट और एडिटिंग फिल्म को देखने लायक बनाए रखते हैं, लेकिन ऐसा कुछ खास नहीं है जो इसे यादगार बनाए। 2 घंटे 18 मिनट की अवधि के बावजूद फिल्म कई जगह खिंची हुई महसूस होती है। कहानी में अनावश्यक दृश्यों को कम करके इसकी गति और प्रभाव दोनों बेहतर किए जा सकते थे।

अंतिम फैसला

'प्रेम कीटाणु' एक हल्की-फुल्की रोमांटिक कॉमेडी बनने की कोशिश करती है, लेकिन कमजोर कहानी, सतही किरदार और फीकी कॉमेडी इसके रास्ते में बड़ी बाधा बन जाते हैं। फिल्म में प्यार, दोस्ती और परिवार जैसे कई विषय हैं, लेकिन इनमें से किसी को भी इतनी गहराई नहीं मिलती कि दर्शक उससे भावनात्मक रूप से जुड़ सके।

वीर पहाड़िया और आफिया सैयद की कोशिश अपनी जगह है, जबकि अपारशक्ति खुराना भी अपने हिस्से की कॉमेडी निभाते हैं, लेकिन कलाकारों का प्रदर्शन कमजोर पटकथा की भरपाई नहीं कर पाता। फिल्म कुछ हल्के-फुल्के पलों में मनोरंजन करती है, लेकिन कुल मिलाकर यह ऐसी प्रेम कहानी नहीं बन पाती जिसे देखने के बाद दर्शक कुछ खास लेकर बाहर निकले। कुल मिलाकर, 'प्रेम कीटाणु' में विचार तो है, लेकिन कहानी और प्रस्तुति में वह दम नहीं है। रोमांस और कॉमेडी के शौकीन दर्शकों को भी यह फिल्म निराश कर सकती है।

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