Breaking News

कहीं रावण दहन तो कहीं दुर्गा विसर्जन, भारत में अलग-अलग रूपों में मनाया जाता है दशहरा


देश 20 October 2026
post

कहीं रावण दहन तो कहीं दुर्गा विसर्जन, भारत में अलग-अलग रूपों में मनाया जाता है दशहरा

विजयादशमी यानी दशहरा बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। भारत के प्रमुख त्योहारों में शामिल यह पर्व अधर्म पर धर्म और असत्य पर सत्य की विजय का संदेश देता है। देश के अलग-अलग हिस्सों में इसे मनाने की परंपराएं भी अलग-अलग हैं। कहीं भगवान राम की रावण पर विजय की स्मृति में रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतलों का दहन किया जाता है, तो कहीं महिषासुर पर मां दुर्गा की विजय के रूप में विजयादशमी मनाई जाती है। पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड और ओडिशा में दुर्गा पूजा के समापन के साथ यह पर्व विशेष सांस्कृतिक रंग में नजर आता है, जबकि उत्तर भारत में रामलीला और रावण दहन इसकी प्रमुख पहचान हैं।

भगवान राम की विजय से जुड़ी है प्रमुख मान्यता

विजयादशमी को लेकर भारतीय परंपरा में सबसे प्रसिद्ध कथा भगवान राम और लंका के राजा रावण से जुड़ी है। मान्यता के अनुसार, भगवान राम ने माता सीता के अपहरण के बाद रावण के विरुद्ध युद्ध किया और दशमी तिथि को उसका वध किया। इसी विजय की स्मृति में दशहरा मनाया जाता है। राम की विजय को केवल एक युद्ध की जीत के रूप में नहीं, बल्कि धर्म और मर्यादा की अधर्म पर विजय के रूप में देखा जाता है। रावण के पुतले का दहन इसी प्रतीकात्मक संदेश को सामने रखता है कि अहंकार, अत्याचार और अन्याय का अंत निश्चित है।

उत्तर भारत में रामलीला और रावण दहन की परंपरा

उत्तर प्रदेश, दिल्ली, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा और उत्तर भारत के अन्य क्षेत्रों में विजयादशमी के अवसर पर रामलीला और रावण दहन की परंपरा व्यापक है। नवरात्र के दौरान कई स्थानों पर रामलीला के मंचन के जरिए रामायण की कथा प्रस्तुत की जाती है। दशमी के दिन राम और रावण के युद्ध का मंचन होता है और इसके बाद रावण के पुतले का दहन किया जाता है। रामलीला केवल धार्मिक आयोजन नहीं है। यह लोकनाट्य की ऐसी परंपरा है, जिसमें अभिनय, संवाद, संगीत, वेशभूषा और मंच सज्जा के माध्यम से रामकथा को आम लोगों तक पहुंचाया जाता है। कई शहरों और कस्बों में पीढ़ियों से रामलीला समितियां इस परंपरा को आगे बढ़ा रही हैं।

अयोध्या और उत्तर प्रदेश में विशेष महत्व

उत्तर प्रदेश में विजयादशमी का संबंध राम की जन्मभूमि अयोध्या और रामकथा की व्यापक लोक परंपरा से भी जुड़ा है। अयोध्या के अलावा वाराणसी, कानपुर, लखनऊ, प्रयागराज, गोरखपुर और कई अन्य शहरों में दशहरे के अवसर पर धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन होते हैं। कई स्थानों पर दशहरा मेले का आयोजन भी किया जाता है। मेले में ग्रामीण और शहरी समाज के लोग बड़ी संख्या में शामिल होते हैं। खिलौने, खान-पान, घरेलू सामान और स्थानीय उत्पादों की दुकानें लगती हैं। इस तरह विजयादशमी धार्मिक पर्व के साथ स्थानीय अर्थव्यवस्था और सामुदायिक मेल-जोल का अवसर भी बनती है।

पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा के समापन का पर्व

पश्चिम बंगाल में विजयादशमी का स्वरूप उत्तर भारत के दशहरा उत्सव से अलग है। यहां यह दिन दुर्गा पूजा के समापन का प्रमुख अवसर होता है। मान्यता है कि मां दुर्गा महिषासुर का वध कर बुराई पर विजय प्राप्त करती हैं। दशमी के दिन देवी की प्रतिमाओं का विसर्जन किया जाता है। विजयादशमी पर बंगाल में सिंदूर खेला की परंपरा भी विशेष रूप से दिखाई देती है। महिलाएं देवी को सिंदूर अर्पित करने के बाद एक-दूसरे को सिंदूर लगाती हैं। इसके बाद मां दुर्गा की प्रतिमा को विदाई दी जाती है। ढाक की थाप, शंखध्वनि, धुनुची नृत्य और विसर्जन यात्रा पूरे वातावरण को भावनात्मक और सांस्कृतिक रंग देते हैं।

बिहार में दुर्गा पूजा और दशहरा मेले की परंपरा

बिहार में विजयादशमी धार्मिक आस्था और लोक संस्कृति दोनों से जुड़ा पर्व है। पटना, गया, मुजफ्फरपुर, भागलपुर, दरभंगा और अन्य शहरों में दुर्गा पूजा के साथ दशहरा उत्सव आयोजित किया जाता है। कई स्थानों पर रावण दहन भी होता है और कहीं मां दुर्गा की प्रतिमा विसर्जन के साथ पर्व का समापन होता है। ग्रामीण बिहार में दशहरा मेले की परंपरा विशेष महत्व रखती है। पूजा स्थलों के आसपास लोक कलाकारों के कार्यक्रम, देवी गीत, भजन और सांस्कृतिक आयोजन होते हैं। मैथिली, भोजपुरी, मगही और अन्य स्थानीय भाषाओं में देवी गीत लोक संस्कृति को समृद्ध करते हैं।

झारखंड में पूजा, मेला और सामुदायिक भागीदारी

झारखंड में विजयादशमी का उत्सव धार्मिक और सामुदायिक दोनों रूपों में दिखाई देता है। रांची, जमशेदपुर, धनबाद, बोकारो और अन्य शहरों में दुर्गा पूजा और दशहरा बड़े स्तर पर मनाया जाता है। पूजा समितियों की ओर से पंडाल, सांस्कृतिक कार्यक्रम और विसर्जन जुलूस आयोजित किए जाते हैं। राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों में दशहरा मेले का अपना महत्व है। स्थानीय लोग पूजा और मेले में सामूहिक रूप से शामिल होते हैं। झारखंड की बहुसांस्कृतिक सामाजिक संरचना के कारण यहां विजयादशमी के आयोजन में अलग-अलग समुदायों की भागीदारी दिखाई देती है।

ओडिशा में शक्ति आराधना और सांस्कृतिक परंपरा

ओडिशा में विजयादशमी का संबंध दुर्गा पूजा से गहराई से जुड़ा है। कटक समेत राज्य के कई हिस्सों में दुर्गा पूजा भव्य रूप से आयोजित होती है। कटक की पूजा में चांदी की आकर्षक सजावट और पारंपरिक शिल्प विशेष पहचान रखता है। दशमी के दिन देवी की प्रतिमाओं का विसर्जन किया जाता है। धार्मिक अनुष्ठानों के साथ स्थानीय संगीत, सांस्कृतिक कार्यक्रम और शोभायात्राएं उत्सव का हिस्सा बनती हैं। यहां विजयादशमी शक्ति की विजय और सामुदायिक एकता के संदेश से जुड़ी दिखाई देती है।

मैसूर में राजसी परंपरा से जुड़ा दशहरा

कर्नाटक का मैसूर दशहरा विजयादशमी के सबसे प्रसिद्ध आयोजनों में शामिल है। इसकी परंपरा राजघराने से जुड़ी रही है। मैसूर में दशहरा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि कला, संस्कृति, संगीत और ऐतिहासिक परंपराओं का बड़ा उत्सव है। विजयादशमी के दिन निकलने वाली शोभायात्रा, सजे हुए हाथी, पारंपरिक संगीत और सांस्कृतिक प्रस्तुतियां इस उत्सव को विशेष पहचान देती हैं। मैसूर का दशहरा दक्षिण भारत की समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा का महत्वपूर्ण उदाहरण है।

हिमाचल में देव संस्कृति से जुड़ा दशहरा

हिमाचल प्रदेश में दशहरा स्थानीय देव संस्कृति से जुड़ी विशिष्ट परंपराओं के साथ मनाया जाता है। कुल्लू का दशहरा देश और दुनिया में प्रसिद्ध है। यहां दशहरा उस समय शुरू होता है जब देश के कई अन्य हिस्सों में रावण दहन के साथ उत्सव समाप्त हो जाता है। कुल्लू में विभिन्न क्षेत्रों के देवी-देवताओं की प्रतिमाएं और रथ उत्सव में शामिल होते हैं। पारंपरिक वाद्य यंत्र, लोक नृत्य और सामुदायिक आयोजन हिमाचली देव संस्कृति की झलक प्रस्तुत करते हैं। यहां दशहरा धार्मिक आस्था के साथ स्थानीय लोक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

महाराष्ट्र में शक्ति और लोक उत्सव का मेल

महाराष्ट्र में विजयादशमी के दिन धार्मिक अनुष्ठानों के साथ सामाजिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। नवरात्र के दौरान देवी की पूजा और गरबा-डांडिया जैसे आयोजन कई शहरों में होते हैं। दशमी के दिन देवी विसर्जन और अन्य धार्मिक गतिविधियों के साथ पर्व का समापन होता है। महाराष्ट्र में दशहरे के दिन आपटा वृक्ष की पत्तियों को पारंपरिक रूप से सोने का प्रतीक मानकर एक-दूसरे को देने की परंपरा भी कई क्षेत्रों में प्रचलित है। यह लोक मान्यता समृद्धि और शुभकामना से जुड़ी है।

गुजरात में नवरात्र के बाद विजयादशमी

गुजरात में नवरात्र नौ रातों तक गरबा और डांडिया की सामूहिक परंपरा के लिए प्रसिद्ध है। विजयादशमी के दिन नवरात्र उत्सव का समापन होता है। यहां देवी शक्ति की आराधना के साथ लोक नृत्य, संगीत और सामुदायिक भागीदारी उत्सव का प्रमुख हिस्सा हैं। गुजरात की यह परंपरा अब देश के दूसरे हिस्सों में भी लोकप्रिय हो चुकी है। बड़े शहरों में नवरात्र आयोजन धार्मिक आस्था के साथ सांस्कृतिक और सामाजिक कार्यक्रम का रूप ले चुके हैं।

दक्षिण भारत में आयुध पूजा और विजयादशमी

दक्षिण भारत के कई हिस्सों में विजयादशमी का संबंध आयुध पूजा और विद्यारंभ की परंपराओं से भी है। कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल और आंध्र प्रदेश-तेलंगाना के कई क्षेत्रों में इस दिन पुस्तकों, वाद्य यंत्रों, औजारों, वाहनों और कार्य में इस्तेमाल होने वाली वस्तुओं की पूजा की जाती है। केरल में विजयादशमी के अवसर पर विद्यारंभ की परंपरा विशेष महत्व रखती है। छोटे बच्चों को शिक्षा की शुरुआत कराई जाती है। इस परंपरा में ज्ञान को जीवन में नई शुरुआत और प्रगति का माध्यम माना जाता है।

दशहरे के साथ जुड़ा है सामाजिक संदेश

विजयादशमी का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व जितना व्यापक है, उतना ही इसका सामाजिक संदेश भी महत्वपूर्ण है। रावण दहन या महिषासुर पर देवी की विजय की कथा मनुष्य को अहंकार, अन्याय, हिंसा और बुराई से दूर रहने का संदेश देती है। दशहरे के आयोजन में अलग-अलग समुदायों की भागीदारी सामाजिक एकता को मजबूत करती है। पूजा पंडाल, रामलीला, मेले, सांस्कृतिक कार्यक्रम और शोभायात्राएं लोगों को सामूहिक रूप से उत्सव मनाने का अवसर देती हैं।

लोक परंपराओं को आगे बढ़ाता है विजयादशमी

विजयादशमी भारत की सांस्कृतिक विविधता का ऐसा पर्व है, जिसके अलग-अलग रूप देश के विभिन्न हिस्सों में दिखाई देते हैं। उत्तर भारत में रामलीला और रावण दहन, बंगाल में दुर्गा विसर्जन, बिहार और झारखंड में पूजा और मेले, ओडिशा में दुर्गोत्सव, गुजरात में नवरात्र की लोक परंपरा, मैसूर में राजसी दशहरा और कुल्लू में देव संस्कृति- ये सभी मिलकर भारतीय पर्व परंपरा की विविधता को सामने लाते हैं। विजयादशमी इसलिए केवल कैलेंडर की एक तिथि या धार्मिक अनुष्ठान नहीं है। यह भारतीय समाज की उस सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक है, जिसमें अलग-अलग भाषाओं, क्षेत्रों और परंपराओं के बावजूद सत्य, धर्म, न्याय और शक्ति की विजय का संदेश साझा है।

You might also like!


Channel not found or invalid API Key.