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अमेरिका में जनगणना प्रस्ताव पर ट्रंप प्रशासन को घेरेंगे भारतीय-अमेरिकी सांसद


विदेश 31 October 2026
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अमेरिका में जनगणना प्रस्ताव पर ट्रंप प्रशासन को घेरेंगे भारतीय-अमेरिकी सांसद

अमेरिका में 2030 में होने वाली अगली जनगणना को लेकर राजनीतिक विवाद गहराता जा रहा है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन की ओर से जनगणना के नियमों में बदलाव के प्रस्ताव का विरोध करते हुए पांच भारतीय-अमेरिकी सांसदों समेत 150 से अधिक डेमोक्रेटिक सांसदों ने मोर्चा खोल दिया है। इन सांसदों ने अमेरिकी प्रशासन से प्रस्तावित नियमों को वापस लेने की मांग की है। भारतीय मूल के सांसदों में प्रमिला जयपाल, रो खन्ना, राजा कृष्णमूर्ति, सुहास सुब्रमण्यम और श्री थानेदार शामिल हैं। इन सभी ने एक सार्वजनिक आपत्ति पत्र पर हस्ताक्षर किए हैं। यह पहल अमेरिकी प्रतिनिधि सभा की निगरानी एवं सरकारी सुधार समिति में डेमोक्रेटिक पार्टी के वरिष्ठ सदस्य रॉबर्ट गार्सिया के नेतृत्व में की गई है। सांसदों का कहना है कि ट्रंप प्रशासन का प्रस्ताव अमेरिकी संविधान के 14वें संशोधन की भावना के खिलाफ है। दरअसल, अमेरिकी संविधान के अनुसार जनगणना में प्रत्येक राज्य की पूरी आबादी की गणना की जाती है। इसी आधार पर प्रतिनिधि सभा में राज्यों की सीटों का निर्धारण होता है। इसके अलावा जनगणना के आंकड़ों का इस्तेमाल चुनावी क्षेत्रों की सीमाएं तय करने और संघीय सरकार की ओर से राज्यों को मिलने वाली वित्तीय सहायता के वितरण में भी किया जाता है। ट्रंप प्रशासन के प्रस्ताव के तहत 2030 की जनगणना में ऐसे गैर-अमेरिकी नागरिकों को प्रतिनिधित्व के लिए इस्तेमाल होने वाली आबादी की गणना से बाहर रखने की योजना है, जिनके पास स्थायी निवास यानी ग्रीन कार्ड नहीं है। इसमें बिना कानूनी दस्तावेजों के रह रहे प्रवासियों के साथ अस्थायी वीजा पर अमेरिका में रहने वाले कुछ विदेशी नागरिक भी शामिल हो सकते हैं। हालांकि, ग्रीन कार्ड धारकों को इस प्रस्ताव के तहत जनसंख्या गणना में शामिल रखने की बात कही गई है। इसके साथ ही जनगणना के मुख्य प्रश्नपत्र से नस्ल, जातीय पहचान और यौन अभिविन्यास से जुड़े सवाल हटाने का प्रस्ताव भी रखा गया है। भारतीय-अमेरिकी सांसदों और अन्य डेमोक्रेट नेताओं का तर्क है कि इन बदलावों से प्रवासी और अल्पसंख्यक समुदायों का प्रतिनिधित्व प्रभावित हो सकता है। उनका कहना है कि जनगणना में किसी समुदाय की वास्तविक आबादी दर्ज नहीं होने से उस समुदाय के लिए सरकारी योजनाओं, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और अन्य सार्वजनिक सुविधाओं के निर्धारण में भी कठिनाई आ सकती है। कांग्रेसनल एशियन पैसिफिक अमेरिकन कॉकस की अध्यक्ष ग्रेस मेंग ने भी इस प्रस्ताव पर चिंता जताई है। उनके मुताबिक, नस्लीय और जातीय आंकड़े एशियाई-अमेरिकी तथा अन्य अल्पसंख्यक समुदायों की जरूरतों और उनके सामने मौजूद असमानताओं को समझने के लिए महत्वपूर्ण हैं। वहीं, सांसदों ने स्पष्ट किया है कि वे इस प्रस्ताव का विरोध संसद और अदालतों दोनों में करेंगे। दूसरी ओर, अमेरिकी जनगणना ब्यूरो का तर्क है कि आबादी की गणना में स्थायी निवास और अमेरिका के साथ नागरिक संबंधों को महत्व दिया जाना चाहिए। ब्यूरो इस उद्देश्य के लिए सरकारी रिकॉर्ड के इस्तेमाल और नागरिकता संबंधी सवाल शामिल करने जैसे विकल्पों पर भी विचार कर रहा है। प्रस्ताव पर सार्वजनिक टिप्पणियां दर्ज कराने की अंतिम तारीख 2 नवंबर 2026 निर्धारित की गई है। फिलहाल यह नियम प्रस्ताव के स्तर पर है और इसे अंतिम रूप नहीं दिया गया है। ऐसे में आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर राजनीतिक और कानूनी बहस तेज होने की संभावना है। खास बात यह है कि अमेरिका में रहने वाले भारतीय मूल के लोगों सहित विभिन्न प्रवासी समुदायों के लिए यह मुद्दा काफी महत्वपूर्ण है, क्योंकि जनगणना के आंकड़े केवल जनसंख्या का रिकॉर्ड नहीं होते, बल्कि देश में राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सरकारी संसाधनों के वितरण को भी प्रभावित करते हैं।

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