ल के मैदान पर जीत हासिल करना किसी भी खिलाड़ी के लिए सबसे यादगार पल होता है, लेकिन कुछ जीत ऐसी होती हैं जिनके पीछे संघर्ष, त्याग और भावनाओं की लंबी कहानी छिपी होती है। भारतीय महिला पहलवान मनीषा भानवाला की स्वर्णिम सफलता भी कुछ ऐसी ही कहानी बयां करती है। मैट पर प्रतिद्वंद्वी को हराकर जब मनीषा ने गोल्ड मेडल अपने नाम किया, तो उनकी खुशी के साथ एक गहरा भावनात्मक पल भी जुड़ गया। जीत के बाद हाथों में अपने पिता की तस्वीर लेकर खड़ी मनीषा की आंखों में खुशी और अपनों को याद करने का दर्द साफ नजर आया। उनकी यह तस्वीर खेल की उपलब्धि से आगे बढ़कर पिता के प्रति प्रेम, सम्मान और उस सपने की कहानी बन गई, जिसे पूरा करने के लिए उन्होंने वर्षों तक मेहनत की।
हरियाणा के जींद जिले के सीवाहा गांव की रहने वाली 29 वर्षीय मनीषा ने कजाखस्तान के अस्ताना में आयोजित सीनियर विश्व कुश्ती चैंपियनशिप में महिलाओं के 59 किलोग्राम भारवर्ग के फाइनल में अमेरिका की अबीगैल नेट को 8-6 से हराकर स्वर्ण पदक जीता। इस जीत के साथ वह सीनियर विश्व कुश्ती चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला पहलवान बन गईं। फाइनल मुकाबला उनके लिए आसान नहीं था। पहले पीरियड में अमेरिकी पहलवान ने शानदार शुरुआत करते हुए 6-0 की बढ़त बना ली थी। मनीषा ने हार नहीं मानी और धीरे-धीरे मुकाबले में वापसी की। पहले पीरियड के अंत तक उन्होंने स्कोर 1-6 कर दिया। दूसरे पीरियड में मनीषा ने अपनी रणनीति बदली और लगातार आक्रमण करते हुए अंक जुटाए। उन्होंने मुकाबले को 6-6 की बराबरी पर पहुंचाया और इसके बाद एक और सफल दांव लगाकर 8-6 की बढ़त हासिल कर ली। आखिरी क्षणों तक उन्होंने अपनी बढ़त बनाए रखी और भारत को ऐतिहासिक स्वर्ण पदक दिलाया
मनीषा की इस सफलता के पीछे उनके पिता सुरेश भानवाला का बड़ा योगदान रहा है। उन्होंने ही बेटी को कुश्ती अपनाने के लिए प्रेरित किया था और उसे विश्व चैंपियन बनाने का सपना देखा था। पिता चाहते थे कि उनकी बेटी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का नाम रोशन करे। मनीषा ने भी इस सपने को अपना लक्ष्य बना लिया था, लेकिन वर्ष 2022 में परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। मनीषा के पिता का दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। यह घटना उस समय हुई, जब मनीषा एशियाई कुश्ती चैंपियनशिप में हिस्सा लेने के लिए मंगोलिया रवाना होने वाली थीं। पिता के अचानक चले जाने से वह बुरी तरह टूट गई थीं। परिवार के लिए भी यह बेहद मुश्किल समय था। हालांकि, उन्होंने हिम्मत जुटाई और प्रतियोगिता में हिस्सा लेने का फैसला किया। उस चैंपियनशिप में उन्होंने कांस्य पदक जीतकर अपने संघर्ष को जारी रखा।













